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भागवत कथा प्रसंग

Updated: Jun 25, 2020

न विटा न नटा न गायका न परद्रोहनिबद्धबुद्धय: । नृपसद्मणि नामको वयं कुचभारोन्नमिता न योषित:।।


न हम विट( परस्त्री से प्रेम करने वाले लम्पटी) हैं न नट हैं, न गवैया(गायक) हैं, न दूसरों से द्वेष रखने वाले हैं, न तो कुचों के भार से झुकी हुई स्त्रियाँ ही हैं, फिर हमको धनीयों से क्या सम्बन्ध हैं ?धोनीयों के पास तो वे लोग जाया करते हैं जो विट ,नट, गायक हुया करता हैं, निस्पृह व्यक्ति वह नही जाते ।

तात्पर्य: जो निस्पृह सन्त है वह धनियों से सम्वन्धों नही रखते हैं। भाले ही उनके पास धन या कोई भोगसामग्री क्युओं न आ जाय फिर भी बह कोई प्रकार भोगों कि उपभोग नही करते हैं । जो व्यक्ति संसार से विरक्त होकर केवल भगवतोन्मुखी हो गया हैं वह व्यक्ति केवल आपना ध्यान ज्ञान अपनी ईष्टदेव मैं ही लगाता है, न वह कोई धनादि व कोई भोगेच्छा की मांग नही करता हैं, जो सत्य ही श्रीठाकुरजी मैं मनोनिवेश किया हैं उनके व्रह्माण्डके सारे भोगादि एवं अनन्तकोटी ब्रह्माण्ड के अधिपति पदभी मिल जाय तो वह कभी स्वीकार नही करता हैं! तो उनकों ईह संसार कि किञ्चित भोगों को उपभोग करने की इच्छा न हो सकता है ना वह उपभोग करता है। जो विरक्त सन्त हैं सच्ची मै निस्पृह है वह जगतके भोग्यवस्तु, धनाढ्य व्यक्त्यादि से दुरी वनायी रखती है। उनके पास भोग्यवस्तु सुलभ होता हैं फिर भी बह भोग्यवस्तुओं का त्याग करते है लगन से आपनी ईष्टदेवकी भजनमैं प्रवृत्त होकर दिव्यानंद का उपभोग करता है वह सच्ची निस्पृह सन्त बैष्णव कहलाता है ।

वैराग्य शतक: श्लोक संख्या: 23 तात्पर्य: दासानुदास श्रीरघुनाथ दास




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